एक दर्द है अहसास है एक दर्द मेरे पास है
उम्र गुज़र गयी है इसे हवा देते देते
एक शॉल जो दबके बार बार भड़क जाता है
क्या मैंने इसे अपनी गरज़ के लिए पला है?
क्या मेरा मन इतना उदास है?
है तो मेरे चेहरे पर भी मुस्कान
पर एक अँधेरा आँखों के पास है
कहीं हाथ बढाती हूँ डर कर फिर
अपने आप में ही सिमट जाती हूँ
क्यों कोई मेरा मज़ाक न बना दे
मेरे अपनेपन को खिलवाड़ न बना दे
एक दिन शायद ये किवाड़ कुल जायेगा
ये बंद परिंदा उड़ जायेगा
पर तब तक यहीं है बसेरा
मेरे मन बहला ले अपने आप को ज़रा
इस क़ैद में ही रहना होगा
काबू और सलीके से जीना होगा

Advertisements